आज इलेक्ट्रिकल मण्डल HPSEBL अम्ब मैं नेशनल कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लॉइज़ एंड इंजीनियर्स के आह्वान पर पूर्ण रूप से पेन डाउन एवं टूल डाउन हड़ताल रही हालांकि, आपातकालीन सेवाओं को हड़ताल से बाहर रखा गया है, जिससे आम जनता को आवश्यक सेवाओं में कोई बाधा नहीं आये।
यहां भोजनावकाश के दौरान बिजली बोर्ड कार्यालय के बाहर निजीकरण के विरोध में जोरदार धरना-प्रदर्शन आयोजित किए गए, जिनमें सैंकड़ों कर्मचारियों, अभियंता, आउटसोर्स कर्मी और बिजली बोर्ड के पेंशनरों के साथ-साथ विद्युत उपभोक्ताओं ने भी भाग लिया।
यह विरोध प्रदर्शन हिमाचल प्रदेश स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के कर्मचारियों, अभियंताओं, आउटसोर्स कर्मचारी और पेंशनभोगियों के संगठनों की संयुक्त कार्रवाई समिति (JAC) के आह्वान पर पूरे प्रदेश में किया गया। प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 का विरोध करना है जिसमे सीधे-सीधे बिजली बोर्ड के निजीकरण की बात कही गई है।
स्थानीय संयुक्त कार्रवाई समिति ने कहा कि केंद्र सरकार लगातार राज्य सरकारों पर बिजली कंपनियों के निजीकरण के लिए दबाव बना रही है। इसी दिशा में बिजली कानून में कई संशोधन प्रस्तावित किए जा चुके हैं। हाल ही में ऊर्जा मंत्रालय द्वारा विद्युत संशोधन विधेयक, 2025 का मसौदा लाया गया है, जिसे वर्तमान बजट सत्र में संसद में पेश किए जाने की संभावना है।
जिन राज्यों में बिजली वितरण का कार्य निजी हाथों में सौंपा गया है, वहां यह प्रयोग अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका है। इससे उपभोक्ताओं के साथ-साथ राज्य सरकारों को भी वित्तीय एवं प्रशासनिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। इसके बावजूद केंद्र सरकार शेष सरकारी बिजली कंपनियों को भी प्रतिस्पर्धा के नाम पर निजी हाथों में देने के प्रयास कर रही है।
प्रस्तावित विधेयक में एक ही क्षेत्र में अनेक वितरण कंपनियों को कार्य करने की अनुमति देने तथा सरकारी बिजली बोर्ड के नेटवर्क का उपयोग निजी कंपनियों को उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है। साथ ही, मध्यम एवं निम्न वर्ग के उपभोक्ताओं को दी जा रही क्रॉस सब्सिडी समाप्त करने का प्रस्ताव है। दूसरी ओर, दूरदराज एवं जनजातीय क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति की जिम्मेदारी सरकारी कंपनी पर ही रखी गई है। इसे राज्य सरकारों की संघीय शक्तियों को कमजोर करने का प्रयास भी बताया गया।
बक्ताओ ने यह भी कहा कि प्रदेश में बिजली क्षेत्र युवाओं के रोजगार का एक बड़ा स्रोत है। निजीकरण से रोजगार के अवसरों में भारी कमी आएगी। वर्तमान में बोर्ड के कुल राजस्व का लगभग 64 प्रतिशत औद्योगिक उपभोक्ताओं से आता है। यदि यह वर्ग निजी कंपनियों के पास चला जाता है, तो सरकारी बिजली कंपनी की वित्तीय स्थिति गंभीर रूप से प्रभावित होगी। इससे कर्मचारियों की सेवा शर्तें, पेंशन भुगतान और भविष्य की सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
निजीकरण के परिणामस्वरूप वितरण ढांचे के रखरखाव कार्य प्रभावित होने की आशंका जताई गई है, जिससे बिजली की गुणवत्ता और उपभोक्ता सेवाएं कमजोर पड़ सकती हैं। निजी कंपनियां बड़े उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देंगी, जबकि छोटे उपभोक्ताओं की सेवाओं की गुणवत्ता घट सकती है।
संयुक्त कार्रवाई समिति ने केंद्र सरकार की स्मार्ट मीटरिंग योजना का भी विरोध किया और कहा कि इसका भारी वित्तीय बोझ प्रदेश की जनता पर डाला जा रहा है, जबकि इसका लाभ भविष्य में निजी कंपनियों को मिलने की संभावना है।
समिति के नेताओं ने स्पष्ट किया कि बिजली बोर्ड का निजीकरण करने के बजाय उसे मजबूत करने की आवश्यकता है। कर्मचारियों की कमी को दूर करने के लिए नई भर्ती की जाए, कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाने हेतु पुरानी पेंशन योजना (OPS) लागू की जाए, और 10–12 वर्षों से कार्यरत आउटसोर्स कर्मियों के लिए स्थायी नीति बनाई जाए। साथ ही, लंबित सेवानिवृत्ति लाभों का तत्काल भुगतान करने की मांग भी दोहराई गई।
इस अवसर पर उपभोक्ताओं ने कहा कि यह लड़ाई केवल कर्मचारियों की नहीं, अपितु उपभोक्ताओं की भी है। यदि केंद्र सरकार निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ती है, तो प्रदेश की जनता बिजली कर्मचारियों के साथ मिलकर इस सार्वजनिक ढांचे को बचाने के लिए व्यापक आंदोलन करेगी।